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March 23, 2026

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गुमनामी का दंश : गुफा में विराजमान यह देवी तीर्थाटन विकास से है कोसों दूर

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पाताल भुवनेश्वर गुफा के निकट शीतला माता की पौराणिक गुफा में लोक मगंल की कामना के लिए देवी का पाठ समय समय पर आयोजित होता रहता है इस पौराणिक गुफा का महत्व बड़ा ही अद्भुत व निराला है

प्राचीन मान्यताओं के अनुसार माता शीतला ब्रहमा जी की पुत्री कही जाती है ब्रह्मा जी ने माता शीतला को धरती पर पूजे जाने के लिए भेजा था। देवलोक से धरती पर माँ शीतला अपने साथ भगवान शिव के पसीने से निर्मित ज्वरासुर को अपना सहायक बनाकर लाईं। तत्कालिक राजा विराट ने माता शीतला को अपने राज्य में रहने के लिए स्थान नहीं दिया माता शीतला ने कुपित होकर राजा विराट के समूचे राज्य में हाहाकार मचा दिया था अपनी गलती का एहसास होने पर राजा विराट ने माँ से क्षमा याचना की और उन्हें भूमंडल में अनेक स्थान प्रदान किये उन्हीं प्राचीन स्थानों में माता शीतला का अलौकिक रहस्य वाला स्थान पाताल भुवनेश्वर के निकट है। यह देवी पूजन से प्रसन्न होकर समस्त व्याधियों का नाश करती है लोक मंगल की कामना को लेकर पाताल भुवनेश्वर मंदिर कमेटी के अध्यक्ष नीलम भंडारी यहाँ समय – समय पर पूजा अर्चना करते रहते है उन्होंने बताया कि यहाँ पूजा का मुख्य उद्देश्य क्षेत्र की सुख समृद्धि एवं मंगल कामना की भावना है

ऐसी मान्यता है, कि माता शीतला का पूजन करने से समस्त प्रकार के रोगों का निदान होता है।खासतौर से चेचक, खुजली ,दाद ,खाज के रोगों के निवारण के लिए यह त्वरित व फलदायी देवी कही गई है। इन्हें खासतौर से नीम के पत्ते भी पूजा में अर्पित किए जाते हैं।*

सुंदर सर्वस्वरूपा माता शीतला का स्वरूप अलौकिक है, ये अपने हाथों में कलश, सूप, मार्जन (झाड़ू) और नीम के पत्ते धारण किए रहती हैं। एक हाथ में ठंडे जल का कलश भी रहता है। इसलिए इन्हें शीतलता का प्रतीक भी माना जाता है।

उत्तराखंड में इनके अनेक मंदिर हैं जिनमें जनपद पिथौरागढ़ के पाताल भुनेश्वर के निकट, गंगोलीहाट, के अलावा काठगोदाम का मन्दिर काफी प्रसिद्व है गढ़वाल के श्रीनगर में भी इनका अति प्राचीन मंदिर आस्था व भक्ति का केंद्र है लेकिन यहाँ गुफा में विराजमान शीतला माता का महत्व सबसे अदितीय है

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